संगीतविशारद गधा - पंचतंत्र - विष्णु शर्मा | Sangeetvisharad Gadha - Panchtantra - Vishnu Sharma by विष्णु शर्मा

संगीतविशारद गधा - पंचतंत्र - विष्णु शर्मा | Sangeetvisharad Gadha - Panchtantra - Vishnu Sharma

संगीतविशारद गधा

साधु मातुल! गीतेन मया प्रोक्तोऽपि न स्थितः ।

अपूर्वोंऽयं मणिर्बद्धः संप्राप्तं गीतलक्षणम् ।।

मित्र की सलाह मानो

एक गांव में उद्धत नाम का गधा रहता था। दिन में धोबी का भार ढोने के बाद रात को वह स्वेच्छा से खेतों में घूमा करता था। सुबह होनो पर वह स्वयं धोबी के पास आ जाता था।
रात को खेतों में घूमते-घूमते उसकी जान-पहचान एक गीदड़ से हो गई। गीदड़ मैत्री करने में बड़े चतुर होते हैं। गधे के साथ गीदड़ भी खेतों में जाने लगा। खेत की बाड़ को तोड़कर गधा अन्दर चला जाता था और वहां गीदड़ के साथ मिलकर कोमल-कोमल ककड़ियां खाकर सुबह अपने घर आ जाता था।
एक दिन गधा उमंग में आ गया। चांदनी रात थी। दूर तक खेत लहलहा रहे थे। गधे ने कहा- “मित्र! आज कितनी निर्मल चांदनी खिली है। जी चाहता है, आज खूब गीत गाऊँ। मुझे सब राग-रागनियां आती हैं। तुझे जो गीत पसंद हो, वही गाऊँगा। भला, कौन-सा गाऊँ, तू ही बता।”
गीदड़ ने कहा- “मामा! इन बातों को रहने दो। क्यों अनर्थ बखेरते हो? अपनी मुसीबत आप बुलाने से क्या लाभ? शायद, तुम भूल गये कि हम चोरी से खेत में आये हैं। चोर को तो खांसना भी मना है, और तुम ऊँचे स्वर से राग-रागनी गाने की सोच रहे हो। और शायद तुम यह भी भूल गए कि तुम्हारा स्वर मधुर नहीं है। तुम्हारी शंखध्वनि दूर-दूर तक जायेगी। इन खेतों के बाहर रखवाले से रहे हैं। वे जाग गये तो तुम्हारी हड्डियां तोड़ देंगे। कल्याण चाहते हो तो इन उमंगो को भूल जाओ; आनंदपूर्वक अमृत जैसी मीठी ककड़ियों से पेट भरो। संगीत का व्यसन तुम्हारे लिए अच्छा नहीं है।”
गीदड़ की बात सुनकर गधे ने उत्तर दिया- “मित्र! तुम वनचर हो, जंगलों में रहते हो, इसीलिये संगीत सुधा का रसास्वाद तुमने नहीं किया है। तभी तुम ऐसी बातें कह रहे हो।”
गीदड़ ने कहा- “मामा! तुम्हारी बात ही ठीक सही, लेकिन तुम भी संगीत तो नहीं जानते, केवल गले से ढीचू-ढीचू करना ही जानते हो।”
गधे को गीदड़ की बात पर क्रोध तो बहुत आया, किंतु क्रोध को पीते हुए बोला- “गीदड़! यदि मुझे संगीत विद्या का ज्ञान नहीं तो किस को होगा? मैं तीनों ग्रामों, सातों स्वरों, 21 मूर्छनाओं, 49 तालों, तीनों लयों और तीस मात्राओं के भेदों को जानता हूँ। राग में तीन यति विराम होते हैं, नौ रस होते हैं। 36 राग-रागिनियों का मैं पंडित हूँ। 40 तरह के संचारी-व्यभिचारी भावों को भी मैं जानता हूँ। तब भी तू मुझे रागी नहीं मानता। कारण, कि तू स्वयं राग-विद्या से अनभिज्ञ है।”
गीदड़ ने कहा- “मामा! यदि यही बात है तो मैं तुझे नहीं रोकूंगा। मैं खेत के दरवाजे पर खड़ा चौकीदारी करता हूँ, तू जैसा जी चाहे गाना गा।”
गीदड़ के जाने के बाद गधे ने अपना आलाप शुरू कर दिया। उसे सुनकर खेत के रखवाले दांत पीसते हुए भागे आये। वहाँ आकर उन्होंने गधे को लाठियों से मार-मार कर जमीन पर गिरा दिया। उन्होंने उसके गले में सांकली भी बांध दी। गधा भी थोड़ी देर कष्ट से तड़पने के बाद उठ बैठा। गधे का स्वभाग है कि वह बहुत जल्दी कष्ट की बात भूल जाता है। लाठियों की मार की याद मूहूर्त भर ही उसे सताती है।
गधे ने थोड़ी देर में सांकली तुड़ा ली और भागना शुरू कर दिया। गीदड़ भी उस समय दूर खड़ा सब तमाशा देख रहा था। मुस्कराते हुए वह गधे से बोला- “क्यों मामा! मेरे मना करते-करते भी तुमने आलापना शुरू कर दिया। इसीलिये तुम्हें यह दंड मिला। मित्रों की सलाह का ऐसा तिरस्कार करना उचित नहीं है।”

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चक्रधर ने इस कहानी को सुनने के बाद स्वर्णसिद्धि से कहा- “मित्र! बात तो सच है। जिसके पास न तो स्वयं बुद्धि है और न जो मित्र की सलाह मानता है, वह मंथरक नाम के जुलाहे की तरह तबाह हो जाता है।”
स्वर्णसिद्धि ने पूछा- “वह कैसे?”
चक्रधर ने तब यह कहानी सुनाई-